सना हूँ जबसे रंगो की बातों से,
दिल और कभी दिमाग के अल्फ़ाज़ों से,
समीकरण मिलाके आखिर में जाना,
अब होगी रंगत पूरी अलग-2 साज़ों से॥
सवालों, जवाबों का छाया है ऐसा असर,
की जब भी जाता हूँ इस शहर से उस शहर,
कुछ गुम तो कभी मैं बिलकुल खो जाता हूँ,
साँसे तो हैं लेकिन बचा नहीं अब कोई कसर॥
और संछेप में बयान करूँ क्या अब तक़दीर,
सारे प्यादे ढेर हुए और बचा है सिर्फ वजीर,
किनारे पे आ अब कोई गलत चाल न चल दूँ,
की छीन जाए एकमात्र जो बाकी है ये शरीर॥
Saturday, 15 August 2015
॥॥ संछेप... ॥॥
Friday, 17 April 2015
॥# आभाव ##
पर लब्ज़ यहाँ थोड़ा और जरा सा है,
गुनगुना भी लूँ पर धुन भी कम यहाँ,
अभाव हर कहीं, कुछ इस तरह सा है॥
आनंद में अब भाषा जुबान की चुन लूँ,
जरुरत हो तो इशारें की चाल भी बुन लूँ,
हर किसी को दूर रखूं ये स्वभाव मेरा,
इतने प्रयासों बाद कौन सी अब धुन लूँ॥
पर तेरी बातों में लगता है इज़हार नया,
तेरी फ़िक्र मेरी नादानी है या और क्या,
समझा सके तो समझा दे मतलब इनका,
या मेरी चुप्पी पे भी नही ऐतबार क्या॥
और खामोशियों की आदत नहीं थी मेरी कभी,
शिकायतों को कम करूँ बस प्रयत्न है अभी,
पर इन सब से हुआ हूँ गुनहगार और ज्यादा,
कैसे नाराज़गी दूर करूँ अब सबकी और सभी॥
इसे लाचारी समझों या पत्थर की आवाज़,
अब क्या करूँ बचा नहीं है मेरा कोई साज़ ॥
Sunday, 1 March 2015
॥॥ औकात...॥
कुछ होगी तो इसमें बात सहज़,
तुझे अनदेखा करने की चाहत है,
इसमें दिखती मेरी औकात महज़॥
जिद्द है ये तेरी तो मैं भी अक्खड़,
यह है बस मेरी एकमात्र पकड़,
मुझे समझाने को कुछ भी कर,
कुछ है जिसने रखा हुआ है जकड़॥
ये टेसू न बहा, न कर कोई फरियाद,
ये रास्ता छोड़ तो होगी जिंदगी आबाद,
होता है सब हासिल खुद को समझ जाने में,
और हर कारवां बन जाता है आखिर याद॥
तो होती है अक्सर क्यों एक ही ज़िक्र,
खुद की नहीं बस किसी बेगाने की फ़िक्र,
अब सोचो नहीं ज्यादा, ये मेरा मत मात्र,
बस खोओ नहीं इन-सब में स्वम् का इत्र॥
Thursday, 12 February 2015
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Saturday, 31 January 2015
इंसान॥॥॥
क्या अभी बाक़ी है इंसान के कुछ हालात,
या खो गए सारे के सारे ही बचे थे जो जज्बात,
ना है कोई चाह ना ही समझाने का है साज़,
उस कातिल के आने के बस हैं सभी मोहताज़॥
छोड़ दी आस और झूठे दिलासे की जरुरत,
अब तो बस इंतज़ार है की कब आये वो महूरत,
वक़्त के साथ कुछ और भी बेबस हो गए अब,
निराश, फिर धोंका कभी न कभी करते हैं सब॥
क्योंकि रूकती नही ये भूख दरिंदगी की कभी,
बस फैसला कर तू जूझने का आज और अभी,
छुपने से कोई क्या बच पाया है वक़्त की मार से,
तो फिर अब सामना कर और जवाब दे प्रहार से॥
हार की बात हो गर कोशिश हो कभी जीतने की,
जो बिन मेहनत मिले सब तो ये बात है कितने की,
और हारा नहीं है जाबांज़ है इंसान तू गर डता रहे,
सामना किया तो परख हुई बात नहीं ये इतनी ही॥
और अंधेरों से नहीं आईने से भी लड़ना है तुझे,
क्योंकि अहम् है, जो कभी पानी से भी ना बुझे॥
Monday, 12 January 2015
हास्य पाखण्ड॥...
चलो कुछ हास्य् का पाखण्ड करता हूँ,
उदासी का ज़िक्र और बात बंद करता हूँ,
परंतु खुशि में भी तो आंसूं छलक जाते हैं,
कमजोर और कुछ जालि दिल साथ आते हैं॥
देखो तुम्हारा आग्रह ये कहाँ ले जा रहा है,
मेरी क्रूरता को कुछ और ज्यादा बढ़ा रहा है,
गुस्से और फ़िक्र दोनों के भाव दिख रहें हैं,
पर मेरी तारीफ के शब्द अब कुछ मिट रहें हैं॥
पर वादा है गर इस हंसी से कुछ सफल होगा,
मौन का, मेरी क्रूरता का व्रत भी विफल होगा,
जब तलख ये सिद्ध नहीं, सुन ले मेरे कटु शब्द,
जो लागे चिंता, दर्द या चाहे हों कितने भी अभद्र॥
और कहते हैं न, जो कमजोर करे उसे दूर करो,
चुना मैंने मौन और सुनो तुमभी खुदके क्रूर करो,
अब मुझसे बात करने की बेमतलब जिद्द को रोको,
दिल को ही नहीं, कुछ अपने दिमाग को भी टोको॥
Thursday, 1 January 2015
गम।।।
कुछ गमो को मुस्कुराते देखा तो बस थाम लिया,
न संभले चंद गम तो फिर सजा इसे मान लिया,
आईना बदलने से सूरत कभी बदला नहीं करती,
खुद को बदलने चले और हाथों में जाम लिया॥
इन अंधेरों में जब गुम हुआ तो अब ये जाना है,
सबसे मुश्किल इस दुनिया में रूठे को मनाना है,
उजाला अक्सर दुश्मन बन कुछ ऐसा समझाती है,
अपनों से ख्वाइश न हो कोई तो ये सफ़र सुहाना है॥
कोई ना दे साथ यहां तो क्यों कोई लड़ता है,
जब गिर के खुद ही सम्भलना यहां पड़ता है,
सहारे की जरुरत नही किसीको फिरभी लेकिन,
हर एक राह किसी के कारण ही कोई मरता है॥
Thursday, 18 December 2014
कत्लेआम॥॥
कर दिया क़त्लेआम सरेआम,
क्या गुनाह अभी और बाकी है,
उजड़ गए अब सैकड़ो ही घर,
क्या नियत में खोंट और बाकी है॥
खेल ली होली खून की अब,
क्या तू परेशान अभी और बाकी है,
अब तो रुकेगा सिलसिला ऐसा या,
क्या ये शैतान अभी और बाकी है॥
अब तो पहुँच गया मासूमियत पे,
क्या तेरा मुकाम अभी और बाकी है,
दफ़न हुए, जल चुके लाखों ही अब,
क्या ये ज़मीन अभी और बाकी है॥
रुक गई आंसू की धार कबकी,
क्या तेरा मुहिम अभी और बाकी है,
मासूमियत छीनी, खत्म हुई इन्शानियत,
क्या कोई इंसान अभी और बाकी है॥
Saturday, 13 December 2014
॥॥ ख्वाइश ॥
ख्वाइश के दो पन्ने कुछ यूँ मैं गाता हूँ,
जैसे अपने दर्द की दास्ताँ यूँहीं सुनाता हूँ,
टूटा नहीं ना ही हमदर्दी की चाह है कोई,
जैसे हार के कुछ किस्से बस गुनगुनाता हूँ॥
इन किस्सों को अपने दिल से यूँ न लगाना,
जैसे किसी कमी का कोई बहाना हो बनाना।
बीत जाता है बहोत वक़्त यूँहीं इस राह में,
कुछ समझने, कुछ समझाने की चाह में,
मौत पे रुकता नही, बस सब बिखर जाता है,
नींद में मिलके भी होश में वो मुकर जाता है॥
गुनाहों की बात न कर मैं कुछ खो जाता हूँ,
होश में होके भी अपने में ही ग़ुम हो जाता हूँ।
मेरी बेमतलबी को नाप ले ऐसा पैमाना कोई नही,
दिखा दे असली सूरत वो आइना कोई नही,
खुद को चीज़ कहूँ तो होती है तकलीफ बहोत,
और बनु नाचीज़ जहाँ ऐसा जमाना कोई नही।।।
Wednesday, 3 December 2014
॥॥ पुतले ॥॥
सब माटी के पुतले, मैं पत्थर की मूरत हूँ,
कोई न समझे कभी न समझे मैं तो ऐसी सूरत हूँ,
पास आये वो और ही उलझे,
और रह कर भी रह न पाये बन जाऊ ऐसी जरुरत हूँ।।
प्यार की बात कभी ना करना ये पत्थर दिल दोहराये,
पछताना ही है तो फिर कोई यहां क्या कर पाए,
भूल है तेरा पास में आना इसीलिए,
बहोत है टोका और बार-बार ये पापी मन यही बतलाए॥
क्यों तुझे किसी की आस है इस जंगल में आके,
खाए बहोत ही धोंके पर फिर भी प्रेम को ताके,
सुधर जा अब भी देर न हुई,
पर तू हटि, अब भी उसी प्यास में रह-रहकर झांके॥